यदि आप DCA (Diploma in Computer Applications) 2nd Semester के छात्र हैं या माखनलाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी (MCU) परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो Internet and E-Commerce विषय के परीक्षा में आने वाले सभी महत्वपूर्ण 26 प्रश्नों के विस्तृत उत्तर (Detailed Notes) नीचे दिए गए हैं। इन्हें अपनी परीक्षा की तैयारी के लिए जरूर पढ़ें।
Unit – 1: इंटरनेट के मूल सिद्धांत (Fundamentals of Internet)
प्रश्न 1 – इन्टरनेट क्या हैं? इन्टरनेट का प्रयोग करने से फायदे तथा हानियाँ समझाइए।
इन्टरनेट का विस्तृत परिचय (Introduction to Internet)
इन्टरनेट (Internet) का पूरा नाम “Interconnected Network” या “International Network” है। तकनीकी रूप से, यह दुनिया भर में फैले अरबों कंप्यूटरों, सर्वरों, राउटर्स और स्मार्ट उपकरणों का एक वैश्विक महाजाल (Global Grid) है। इंटरनेट किसी एक व्यक्ति या सरकार के अधीन नहीं है, बल्कि यह विभिन्न संगठनों (जैसे W3C, IETF) द्वारा बनाए गए नियमों के तहत काम करता है।
इंटरनेट की शुरुआत 1969 में अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा ARPANET (Advanced Research Projects Agency Network) के रूप में की गई थी। इंटरनेट पर डेटा को पैकेट स्विचिंग (Packet Switching) तकनीक द्वारा भेजा जाता है, जिसमें TCP/IP प्रोटोकॉल मुख्य भूमिका निभाता है।
इन्टरनेट के विस्तृत फायदे (Advantages of Internet)
- शिक्षा और अनुसंधान में क्रांति (E-Education & Research): छात्र घर बैठे इंटरनेट के माध्यम से देश-विदेश के नोट्स, रिसर्च पेपर और वीडियो लेक्चर्स (जैसे YouTube, Udemy) से पढ़ाई कर सकते हैं।
- व्यापारिक विस्तार और ई-कॉमर्स (Business & E-Commerce): एक छोटा व्यापारी भी अपनी वेबसाइट या सोशल मीडिया के दम पर वैश्विक स्तर पर सामान बेच सकता है।
- त्वरित संचार (Instant Communication): वीडियो कॉलिंग, ई-मेल और सोशल नेटवर्किंग (WhatsApp, Facebook) के जरिए दुनिया में कहीं भी तुरंत संपर्क किया जा सकता है।
- ई-गवर्नेंस (E-Governance): सरकारी योजनाएं, पैन कार्ड, आधार, ड्राइविंग लाइसेंस और टैक्स रिटर्न जैसे सभी काम अब ऑनलाइन घर बैठे किए जा सकते हैं।
इन्टरनेट की हानियाँ (Disadvantages of Internet)
- साइबर सुरक्षा और डेटा चोरी (Cyber Crimes): हैकिंग, फ़िशिंग (Phishing) और वायरस के जरिए ऑनलाइन धोखाधड़ी और बैंक खातों से पैसे चोरी होने का खतरा रहता है।
- मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव (Health Issues): अत्यधिक सोशल मीडिया और रील्स की लत के कारण एकाग्रता में कमी, अनिद्रा और आंखों की कमजोरी जैसी समस्याएं होती हैं।
- समय की बर्बादी (Waste of Time): बिना किसी उद्देश्य के इंटरनेट स्क्रॉलिंग करने से छात्रों का कीमती समय बर्बाद होता है।
- फेक न्यूज़ (Fake News): इंटरनेट पर बिना जांच-पड़ताल के अफवाहें और गलत जानकारियां बहुत तेजी से फैलती हैं।
प्रश्न 2 – इंटरनेट और intranet (इंट्रानेट) में अंतर समझाइए।
इंटरनेट और इंट्रानेट दोनों ही नेटवर्क हैं, लेकिन इनका कार्यक्षेत्र और पहुंच बिल्कुल अलग होती है:
| तुलना का आधार | इंटरनेट (Internet) | इंट्रानेट (Intranet) |
| पहुंच का दायरा | यह एक सार्वजनिक (Public) नेटवर्क है, इसे दुनिया का कोई भी व्यक्ति चला सकता है। | यह एक निजी (Private) नेटवर्क है, इसे केवल एक विशिष्ट संगठन के अंदर ही एक्सेस किया जा सकता है। |
| सुरक्षा स्तर | इसमें सुरक्षा बहुत कम होती है क्योंकि यह सभी के लिए खुला है। | यह अत्यधिक सुरक्षित होता है। इसमें बाहरी दुनिया से सुरक्षा के लिए मजबूत Firewall का उपयोग होता है। |
| गति (Speed) | इंटरनेट की गति सर्विस प्रोवाइडर और ट्रैफिक पर निर्भर करती है, जो कभी-कभी धीमी हो सकती है। | इसकी गति बहुत तेज होती है क्योंकि इसमें सीमित उपयोगकर्ता और लोकल लैन (LAN) केबल्स का उपयोग होता है। |
| उपयोगकर्ता | इसके उपयोगकर्ताओं की संख्या असीमित है। | इसके उपयोगकर्ता सीमित (केवल कंपनी के स्टाफ) होते हैं। |
| मुख्य उद्देश्य | दुनिया भर में सूचनाओं का आदान-प्रदान और सामान्य संचार करना। | कंपनी के कर्मचारियों के बीच डेटा, फाइल्स और सॉफ्टवेयर को सुरक्षित रूप से साझा करना। |
| उदाहरण | [www.google.com](https://www.google.com) पर जाकर कुछ भी सर्च करना। | किसी बैंक के कर्मचारियों द्वारा केवल अपने बैंक की आंतरिक शाखाओं में सॉफ्टवेयर चलाना। |
प्रश्न 3 – इन्टरनेट कनेक्टिविटी क्या हैं? यह कितने प्रकार की होती हैं समझाइए।
इन्टरनेट कनेक्टिविटी क्या है? (What is Internet Connectivity?)
वह प्रक्रिया या बुनियादी ढांचा (जैसे मॉडम, राउटर, केबल्स) जिसके माध्यम से हमारा कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल फोन इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISP – Internet Service Provider जैसे Jio, Airtel, BSNL) के मुख्य नेटवर्क से जुड़ता है, इंटरनेट कनेक्टिविटी कहलाती है।
इंटरनेट कनेक्टिविटी के प्रमुख प्रकार:
A. तारयुक्त कनेक्शन (Wired Connections)
- डायल-अप कनेक्शन (Dial-Up): यह सबसे पुरानी और धीमी तकनीक है। इसमें मौजूदा टेलीफोन लाइनों और मॉडम (Modem) का उपयोग किया जाता था। इसकी गति केवल 56 Kbps तक होती थी।
- डीएसएल (DSL – Digital Subscriber Line): यह भी कॉपर टेलीफोन लाइनों का उपयोग करता है, लेकिन इसमें डेटा और वॉयस दोनों अलग-अलग फ्रीक्वेंसी पर चलते हैं, जिससे इंटरनेट चलाते समय भी फोन पर बात की जा सकती है।
- केबल इंटरनेट (Cable Internet): यह कनेक्शन टीवी केबल (Coaxial Cable) के माध्यम से दिया जाता है। इसकी बैंडविड्थ अच्छी होती है।
- फाइबर ऑप्टिक / FTTH (Fiber to the Home): यह वर्तमान युग की सबसे तेज तकनीक है। इसमें डेटा तांबे के तारों के बजाय कांच के पतले धागों (Optical Fiber) से होकर प्रकाश की तरंगों (Light Signals) के रूप में यात्रा करता है। इसमें 1 Gbps तक की गति मिलती है।
B. ताररहित कनेक्शन (Wireless Connections)
- वाई-फाई (Wi-Fi – Wireless Fidelity): यह रेडियो तरंगों (Radio Waves) का उपयोग करके एक निश्चित सीमित दायरे (घर या ऑफिस) में वायरलेस इंटरनेट प्रदान करता है।
- मोबाइल सेलुलर नेटवर्क (4G / 5G): इसमें मोबाइल टावरों के नेटवर्क और सिम कार्ड का उपयोग किया जाता है। 5G तकनीक में लेटेंसी (Latency) बहुत कम होती है और स्पीड बहुत तेज होती है।
- सैटेलाइट इंटरनेट (Satellite Internet): यह पहाड़ी या दूरदराज के इलाकों के लिए उपयोगी है। इसमें सीधे अंतरिक्ष में स्थित उपग्रहों (जैसे Starlink) से सिग्नल लिए जाते हैं।
प्रश्न 4 – URL (यूनिफार्म रिसोर्स लोकेटर) से आप क्या समझते हैं।
URL का विस्तृत विवरण (What is URL?)
URL का पूरा नाम Uniform Resource Locator है। इंटरनेट पर मौजूद प्रत्येक रिसोर्स (जैसे वेब पेज, पीडीएफ, इमेज, वीडियो) का एक अद्वितीय (Unique) पता होता है, जिसे ढूंढने के लिए ब्राउज़र URL का उपयोग करता है। 1994 में टिम बर्नर्स-ली ने इसकी अवधारणा पेश की थी।
URL की विस्तृत संरचना (Anatomy of a URL)
उदाहरण के लिए: [https://sub.chandlaboard.in/exams/dca/index.html](https://sub.chandlaboard.in/exams/dca/index.html)
- Protocol (
https://): यह नियमों का समूह है जो बताता है कि डेटा कैसे ट्रांसफर होगा।Sका अर्थ है Secure, जो डेटा को एन्क्रिप्ट करके भेजता है। - Sub-domain (
sub.याwww): यह मुख्य वेबसाइट का एक विशिष्ट उप-भाग होता है। - Domain Name (
chandlaboard.in): यह वेबसाइट का मुख्य नाम या पहचान होती है। इसमें.inको Top Level Domain (TLD) कहते हैं। - Path / Directory (
/exams/dca/): यह सर्वर के अंदर बने फोल्डर्स का रास्ता दिखाता है कि फाइल किस फोल्डर के अंदर रखी है। - File Name (
index.html): यह वह वास्तविक वेब पेज है जिसे यूजर देखना चाहता है।
प्रश्न 5 – प्रोटोकॉल से आप क्या समझते हैं? समझाइए।
प्रोटोकॉल क्या है? (What is Protocol?)
इंटरनेट या किसी भी नेटवर्क पर दो या दो से अधिक कंप्यूटरों के बीच डेटा के सुरक्षित और सही आदान-प्रदान (Communication) के लिए बनाए गए नियमों और प्रक्रियाओं के समूह (Set of Rules) को प्रोटोकॉल कहते हैं। बिना प्रोटोकॉल के दो अलग-अलग प्रकार के कंप्यूटर आपस में बात नहीं कर सकते।
प्रमुख इंटरनेट प्रोटोकॉल्स का विवरण:
- TCP/IP (Transmission Control Protocol / Internet Protocol): यह इंटरनेट का मुख्य प्रोटोकॉल है। TCP बड़ी फाइलों को छोटे पैकेट्स में तोड़ता है, और IP उन्हें सही पते (Destination Address) तक पहुंचाता है।
- HTTP (Hypertext Transfer Protocol): वेब ब्राउज़र और वेब सर्वर के बीच वेब पेजों (HTML) को ट्रांसफर करने के लिए इसका उपयोग होता है।
- HTTPS (HTTP Secure): यह HTTP का सुरक्षित रूप है, जो SSL/TLS सुरक्षा परत का उपयोग करके डेटा को कूटभाषा (Encryption) में बदल देता है, जैसे बैंकिंग साइट्स में।
- FTP (File Transfer Protocol): इंटरनेट पर नेटवर्क के माध्यम से बड़ी फाइलों को अपलोड या डाउनलोड करने के लिए इसका उपयोग होता है।
- SMTP (Simple Mail Transfer Protocol): इंटरनेट पर ईमेल को सेंडर के कंप्यूटर से सर्वर तक भेजने (Send) के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
Unit – 2: वेब तकनीक और ऑनलाइन सेवाएं (Web Technology)
प्रश्न 6 – क्लाइंट सर्वर आर्किटेक्चर क्या हैं?
विस्तृत अवधारणा (Client-Server Architecture)
क्लाइंट-सर्वर आर्किटेक्चर एक विकेंद्रीकृत (Distributed) नेटवर्क संरचना है, जहां पूरे नेटवर्क के कार्यों को दो श्रेणियों में बांटा जाता है: क्लाइंट (Client) और सर्वर (Server)। यह पूरे इंटरनेट का आधार स्तंभ है।
- क्लाइंट (Client): यह उपयोगकर्ता का उपकरण या एप्लीकेशन (जैसे कंप्यूटर, स्मार्टफोन या Chrome ब्राउज़र) होता है, जो किसी सेवा या जानकारी के लिए सर्वर को अनुरोध (Request) भेजता है।
- सर्वर (Server): यह एक अत्यधिक शक्तिशाली कंप्यूटर होता है जो 24×7 चालू रहता है। यह क्लाइंट के अनुरोध को प्राप्त करता है, उस पर प्रोसेस करता है, और मांगी गई जानकारी या रिस्पॉन्स (Response) वापस क्लाइंट को भेजता है।
जब आप गूगल पर कुछ सर्च करते हैं, तो आपका मोबाइल ‘क्लाइंट’ है और गूगल का डेटा सेंटर ‘सर्वर’ है।
प्रश्न 7 – रिमोट लोगिंग को समझाइए।
रिमोट लॉगिंग और एक्सेस (Remote Logging / Access)
रिमोट लॉगिंग एक ऐसी तकनीक है जिसके द्वारा एक उपयोगकर्ता भौगोलिक रूप से दूर स्थित किसी अन्य कंप्यूटर (जो इंटरनेट से जुड़ा हो) के डेस्कटॉप इंटरफेस या कमांड लाइन को अपने स्थानीय कंप्यूटर की स्क्रीन पर देख सकता है और उसे पूरी तरह से नियंत्रित कर सकता है।
कार्यप्रणाली और सॉफ्टवेयर
इसके लिए दोनों कंप्यूटरों में एक रिमोट डेस्कटॉप सॉफ्टवेयर होना जरूरी है। आज के समय में AnyDesk, TeamViewer, या Windows Remote Desktop का उपयोग किया जाता है। इसके तहत एक यूनीक आईडी और पासवर्ड के जरिए कनेक्शन स्थापित होता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से तकनीकी सहायता (IT Support), सर्वर मेंटेनेंस और वर्क फ्रॉम होम (Work from Home) के लिए किया जाता है।
प्रश्न 8 – ऑनलाइन बिजली बिल का भुगतान कैसे करते हैं।
ऑनलाइन बिजली बिल का भुगतान करने की चरण-दर-चरण प्रक्रिया निम्नलिखित है:
- माध्यम चुनें: सबसे पहले तय करें कि भुगतान बिजली विभाग की आधिकारिक वेबसाइट से करना है या किसी डिजिटल वॉलेट ऐप (जैसे Paytm, PhonePe, Google Pay) से।
- Electricity विकल्प पर जाएं: पेमेंट ऐप (जैसे PhonePe) खोलें और ‘Recharge & Bill Payments’ सेक्शन में जाकर ‘Electricity’ आइकन पर क्लिक करें।
- बिजली बोर्ड चुनें: अपने राज्य (जैसे मध्य प्रदेश) और संबंधित बिजली प्रदाता कंपनी (जैसे MP Poorv Kshetra Vidyut Vitaran) का चयन करें।
- उपभोक्ता संख्या (IVRS नंबर) दर्ज करें: अपने पुराने कागजी बिल पर लिखा हुआ उपभोक्ता क्रमांक (Consumer/IVRS Number) दर्ज करें।
- बिल सत्यापित करें: ऐप स्वतः ही सर्वर से बिल का डेटा फैच करेगा। स्क्रीन पर उपभोक्ता का नाम और कुल बिल राशि दिखाई देगी, इसकी जांच करें।
- सुरक्षित भुगतान करें: भुगतान के लिए UPI, डेबिट/क्रेडिट कार्ड या नेट बैंकिंग में से किसी एक को चुनें और अपना गोपनीय UPI PIN या OTP दर्ज करें। भुगतान सफल होते ही रसीद प्राप्त हो जाएगी।
प्रश्न 9 – सर्च इंजन क्या हैं यह कैसे काम करता हैं समझाइए।
सर्च इंजन क्या है? (What is Search Engine?)
सर्च इंजन एक विशेष सॉफ्टवेयर प्रोग्राम है जो इंटरनेट के विशाल नेटवर्क पर उपयोगकर्ता द्वारा खोजे गए शब्दों (Keywords) के आधार पर संबंधित वेबसाइटों की सूची ढूंढकर स्क्रीन पर प्रदर्शित करता है। उदाहरण: Google, Bing, Yahoo।
सर्च इंजन की कार्यप्रणाली (How it Works)
सर्च इंजन मुख्य रूप से तीन चरणों में काम करता है:
- क्रॉलिंग (Crawling): सर्च इंजन के पास विशेष स्वचालित प्रोग्राम होते हैं जिन्हें Web Crawlers या Spiders कहा जाता है। ये इंटरनेट पर नए और पुराने वेब पेजों को लगातार स्कैन करते रहते हैं।
- इंडेक्सिंग (Indexing): क्रॉलिंग के दौरान मिली सभी जानकारियों और कीवर्ड्स का विश्लेषण करके उन्हें एक विशाल डेटाबेस (डिजिटल लाइब्रेरी) में व्यवस्थित करके स्टोर कर लिया जाता है।
- रैंकिंग और रिजल्ट (Ranking & Retrieval): जब कोई यूजर कुछ सर्च करता है, तो सर्च इंजन का एल्गोरिदम अपने इंडेक्स में से सबसे सटीक और उपयोगी जानकारी ढूंढता है और गुणवत्ता के आधार पर सर्वश्रेष्ठ वेब पेजों को क्रमानुसार (रैंकिंग देकर) SERP (Search Engine Results Page) पर प्रदर्शित करता है।
प्रश्न 10 – वेब ब्राउज़र क्या हैं? समझाइए।
वेब ब्राउज़र की परिभाषा (What is Web Browser?)
वेब ब्राउज़र एक एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर है, जिसका उपयोग इंटरनेट पर मौजूद वेबसाइटों, वेब पेजों और चित्रों को देखने के लिए किया जाता है। वर्ल्ड वाइड वेब (WWW) में प्रवेश करने के लिए ब्राउज़र एक मुख्य इंटरफेस की तरह काम करता है। यह सर्वर से मिलने वाले HTML/CSS कोड को अपनी रेंडरिंग इंजन की मदद से इंसानों के समझने योग्य विजुअल पेज में बदलता है।
प्रमुख वेब ब्राउज़र्स के उदाहरण:
- Google Chrome (가장 लोकप्रिय)
- Mozilla Firefox
- Microsoft Edge
- Apple Safari
वेब ब्राउज़र के मुख्य भाग:
- Address Bar: जहां वेबसाइट का URL टाइप किया जाता है।
- Navigation Buttons: Back, Forward और Refresh बटन।
- Cookies & Cache Storage: यह वेबसाइटों द्वारा यूजर की पसंद को याद रखने और इमेजेस को लोकल स्टोरेज में सेव रखने के लिए छोटी फाइलें स्टोर करता है ताकि साइट दोबारा जल्दी खुल सके।
Unit – 3: HTML द्वारा वेब डिजाइनिंग (Web Designing with HTML)
प्रश्न 11 – HTML से आप क्या समझते हैं? विस्तार पूर्वक समझाइए।
HTML का परिचय (Introduction to HTML)
HTML का पूरा नाम Hypertext Markup Language है। यह कोई प्रोग्रामिंग भाषा नहीं है, बल्कि एक मार्केअप भाषा (Markup Language) है, जिसका उपयोग वेब पेज (Web Page) और वेबसाइट का ढांचा (Structure) तैयार करने के लिए किया जाता है। इसका विकास टिम बर्नर्स-ली (Tim Berners-Lee) ने 1991 में किया था। वर्तमान में इसका नवीनतम संस्करण HTML5 उपयोग किया जा रहा है।
कोर अवधारणाएं:
- Hypertext: इसका मतलब है वह टेक्स्ट जिसके अंदर किसी अन्य वेब पेज का लिंक (Hyperlink) छुपा होता है, जिस पर क्लिक करके दूसरे पेज पर जाया जा सकता है।
- Markup Language: इसमें टेक्स्ट को व्यवस्थित और फॉर्मेट करने के लिए विशेष संकेतों या कोड का उपयोग किया जाता है, जिन्हें Tags कहते हैं।
- विशेषताएं: यह प्लेटफॉर्म स्वतंत्र (Platform Independent) है, इसे किसी भी नोटपैड में लिखकर
.htmlएक्सटेंशन के साथ सेव किया जा सकता है और किसी भी ब्राउज़र पर रन किया जा सकता है।
प्रश्न 12 – HTML के बेसिक टैग्स या एलेमेंट्स को समझाइए।
HTML में सभी कोड एंगुलर ब्रैकेट < > के अंदर बंद टैग्स के रूप में लिखे जाते हैं। ये जोड़ी में होते हैं: ओपनिंग टैग <tag> और क्लोजिंग टैग </tag>।
HTML का बेसिक स्ट्रक्चर (Basic Structure):
HTML
<!DOCTYPE html>
<html>
<head>
<title>पेज का शीर्षक (Title)</title>
</head>
<body>
<h1>यह मुख्य हेडिंग है</h1>
<p>यह एक पैराग्राफ है।</p>
</body>
</html>
मूल टैग्स का विवरण:
<!DOCTYPE html>: यह निर्देश ब्राउज़र को बताता है कि यह फाइल HTML5 संस्करण में लिखी गई है।<html>: यह HTML का रूट (मुख्य) एलिमेंट है। पूरा कोड इसी के अंदर बंद होता है।<head>: इस टैग में वेब पेज के बारे में तकनीकी जानकारियां (Metadata), सीएसएस और जावास्क्रिप्ट के लिंक्स होते हैं।<title>: इसके अंदर लिखा गया टेक्स्ट ब्राउज़र के टैब बार पर दिखाई देता है।<body>: यह वेब पेज का मुख्य दृश्य भाग होता है। इसमें टेक्स्ट, इमेज, लिंक, टेबल आदि लिखे जाते हैं जो यूजर को स्क्रीन पर दिखाई देते हैं।<h1>से<h6>: ये हेडिंग टैग्स हैं।<h1>सबसे बड़ी हेडिंग और<h6>सबसे छोटी हेडिंग के लिए होता है।<p>: यह पैराग्राफ (Paragraph) बनाने के लिए उपयोग होता है।
प्रश्न 13 – HTML में प्रयोग होने वाली विभिन्न फोर्मेटिंग को समझाइए।
HTML में टेक्स्ट को सुंदर, आकर्षक और विशिष्ट दिखाने के लिए निम्नलिखित फॉर्मेटिंग टैग्स का उपयोग किया जाता है:
<b>(Bold): टेक्स्ट को केवल भौतिक रूप से मोटा (Dark) करने के लिए।<strong>: यह टेक्स्ट को बोल्ड करता है और सर्च इंजन को बताता है कि यह टेक्स्ट महत्वपूर्ण है।<i>(Italic): टेक्स्ट को दाईं ओर थोड़ा तिरछा करने के लिए।<u>(Underline): टेक्स्ट के नीचे अंडरलाइन खींचने के लिए।<mark>: टेक्स्ट के बैकग्राउंड को पीले रंग से हाईलाइट करने के लिए।<del>(Delete): टेक्स्ट के बीच में एक कटी हुई लाइन दिखाने के लिए (उदा: पुरानी कीमत काटने के लिए)।<sub>(Subscript): अक्षरों को सामान्य लाइन से थोड़ा नीचे लिखने के लिए (जैसे रासायनिक सूत्र: H2O)।<sup>(Superscript): अक्षरों को सामान्य लाइन से ऊपर घात के रूप में लिखने के लिए (जैसे गणितीय सूत्र: A2)।
प्रश्न 14 – HTML में लिस्ट टैग को समझाइए।
वेब पेज पर डेटा को बिंदुओं (Points) के रूप में दिखाने के लिए लिस्ट टैग का उपयोग किया जाता है। HTML में मुख्य रूप से तीन प्रकार की लिस्ट होती हैं:
1. ऑर्डर्ड लिस्ट (Ordered List – <ol>)
इसे नंबर वाली लिस्ट भी कहते हैं। इसमें क्रम महत्वपूर्ण होता है। इसके type अट्रिब्यूट द्वारा हम 1, A, a, I, i आदि क्रम चुन सकते हैं।
HTML
<ol type="1">
<li>DCA Course</li>
<li>PGDCA Course</li>
</ol>
2. अनऑर्डर्ड लिस्ट (Unordered List – <ul>)
इसे बुलेट वाली लिस्ट भी कहते हैं। इसमें क्रम का महत्व नहीं होता। इसके type अट्रिब्यूट की वैल्यू disc, circle, या square हो सकती है।
HTML
<ul type="circle">
<li>Mouse</li>
<li>Keyboard</li>
</ul>
3. डेफिनिशन लिस्ट (Definition List – <dl>)
यह शब्दकोश (Dictionary) की तरह काम करती है। इसमें शब्द के लिए <dt> (Definition Term) और परिभाषा के लिए <dd> (Definition Description) टैग का उपयोग होता है।
प्रश्न 15 – HTML में टेबल टैग को समझाइए।
HTML में डेटा को रो (Rows) और कॉलम (Columns) के रूप में यानी सारणीबद्ध (Tabular Form) प्रदर्शित करने के लिए <table> टैग का उपयोग किया जाता है।
टेबल से जुड़े मुख्य सब-टैग्स:
<table>: टेबल की शुरुआत और अंत करने के लिए।<tr>(Table Row): टेबल में एक नई आड़ी लाइन (Row) बनाने के लिए।<th>(Table Heading): टेबल की हेडिंग बनाने के लिए (यह टेक्स्ट को बोल्ड और सेंटर करता है)।<td>(Table Data): टेबल के सेल्स (Cells) में वास्तविक डेटा भरने के लिए।
मुख्य अट्रिब्यूट्स (Attributes):
border: टेबल की लाइनों की मोटाई तय करने के लिए।cellpadding: सेल की बाउंड्री और अंदर के टेक्स्ट के बीच की दूरी बढ़ाने के लिए।colspan: दो या दो से अधिक कॉलम को आपस में जोड़ने के लिए (Horizontal Merge)।rowspan: दो या दो से अधिक रो को आपस में ऊपर-नीचे जोड़ने के लिए (Vertical Merge)।
कोड का उदाहरण:
HTML
<table border="1" cellpadding="5">
<tr>
<th>Student Name</th>
<th>Roll Number</th>
</tr>
<tr>
<td>Pushpendra</td>
<td>101</td>
</tr>
</table>
Unit – 4: जावास्क्रिप्ट स्क्रिप्टिंग (JavaScript Programming)
प्रश्न 16 – जावा स्क्रिप्ट का परिचय।
जावास्क्रिप्ट (JavaScript) क्या है?
जावास्क्रिप्ट (JS) एक हल्की (Lightweight), ओपन-सोर्स और इंटरप्रिटेड क्लाइंट-साइड स्क्रिप्टिंग भाषा है। इसका उपयोग मुख्य रूप से वेब पेजों को डायनेमिक (गतिशील) और इंटरैक्टिव बनाने के लिए किया जाता है। इसका विकास 1995 में नेटस्केप (Netscape) कंपनी के ब्रेंडन इक (Brendan Eich) ने किया था।
जावास्क्रिप्ट के मुख्य कार्य:
- फॉर्म वैलिडेशन (Form Validation): यूजर द्वारा फॉर्म सबमिट करने से पहले इनपुट डेटा (जैसे मोबाइल नंबर, ईमेल) को ब्राउज़र में ही चेक करना।
- इंटरैक्टिविटी बढ़ाना: इमेज स्लाइडर, ड्रॉप-डाउन मेनू, और क्लिक करने पर पॉप-अप बॉक्स खोलना।
- क्लाइंट-साइड रन होना: यह कोड सर्वर पर रन नहीं होता, बल्कि यूजर के ब्राउज़र के अंदर ही तुरंत निष्पादित (Execute) होता है।
प्रश्न 17 – जावास्क्रिप्ट में प्रयोग होने वाले data types, Variables और operators को समझाइए।
1. वेरिएबल्स (Variables)
वेरिेएबल्स डेटा वैल्यूज को स्टोर करने के लिए कंटेनर की तरह होते हैं। जावास्क्रिप्ट में वेरिएबल्स घोषित करने के लिए तीन कीवर्ड्स का उपयोग होता है:
var: पुराना कीवर्ड, जो फंक्शन-स्कोप होता है।let: आधुनिक कीवर्ड, जो ब्लॉक-स्कोप होता है और अधिक सुरक्षित है।const: स्थिर वेरिएबल, जिसमें एक बार वैल्यू डालने के बाद उसे बदला नहीं जा सकता (जैसेconst pi = 3.14;)।
2. डेटा टाइप्स (Data Types)
- Number: सभी प्रकार की संख्याएं (जैसे
25,99.50)। - String: अक्षरों का समूह, जिसे उद्धरण चिह्नों (
"") में लिखा जाता है। - Boolean: केवल दो वैल्यू—
true(सत्य) याfalse(असत्य)। - Undefined: जब वेरिएबल घोषित हो पर उसमें कोई मान न डाला गया हो।
- Object: की-वैल्यू पेयर्स का समूह।
3. ऑपरेटर्स (Operators)
- Arithmetic Operators:
+(जोड़),-(घटाव),*(गुणा),/(भाग),%(शेषफल)। - Comparison Operators:
==(बराबर है),===(वैल्यू और डेटा टाइप दोनों बराबर हैं),>,<। - Logical Operators:
&&(AND),||(OR),!(NOT)।
प्रश्न 18 – जावास्क्रिप्ट में प्रयोग होने वाले कण्ट्रोल फ्लो स्टेटमेंट को समझाइए।
कंट्रोल फ्लो स्टेटमेंट प्रोग्राम के प्रवाह (Execution Flow) को नियंत्रित करते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं:
1. कंडीशनल स्टेटमेंट (Conditional Statements)
- if statement: यदि दी गई शर्त सही है, तो कोड ब्लॉक चलेगा।
- if-else statement: यदि शर्त सही है तो
ifब्लॉक, नहीं तोelseब्लॉक का कोड चलेगा। - Switch Case: जब एक ही वेरिएबल के कई अलग-अलग विकल्पों (Cases) की जांच करनी हो, तो
if-elseके स्थान परSwitchका उपयोग किया जाता है जो कोड को साफ सुथरा बनाता है।
2. लूपिंग स्टेटमेंट (Looping Statements)
जब किसी कोड को बार-बार दोहराना हो, तो लूप का उपयोग होता है:
- for loop: जब पहले से पता हो कि लूप को कितनी बार चलाना है।
- while loop: इसे एंट्री-कंट्रोल लूप कहते हैं। यह तब तक चलता है जब तक शर्त सत्य रहती है।
- do-while loop: इसे एग्जिट-कंट्रोल लूप कहते हैं। इसमें शर्त की जांच अंत में होती है, इसलिए यह कम से कम एक बार जरूर चलता है, चाहे शर्त गलत ही क्यों न हो।
प्रश्न 19 – जावास्क्रिप्ट में प्रयोग होने वाले फंक्शन्स को समझाइए।
फंक्शन क्या है? (What is Function?)
फंक्शन कोड का एक ऐसा ब्लॉक (समूह) होता है, जिसे किसी विशेष कार्य को करने के लिए डिज़ाइन किया जाता है। फंक्शन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि कोड को एक बार लिखकर उसे पूरे प्रोग्राम में बार-बार इस्तेमाल (Code Reusability) किया जा सकता है, जिससे कोड का आकार छोटा हो जाता है।
फंक्शन के प्रकार:
- Built-in Functions: भाषा में पहले से बने-बनाए फंक्शन जैसे
alert(),prompt(),parseInt()। - User-Defined Functions: प्रोग्रामर अपनी जरूरत के अनुसार स्वयं बनाता है।
उदाहरण कोड:
JavaScript
// फंक्शन की परिभाषा (Definition)
function sayHello(name) {
return "नमस्ते " + name;
}
// फंक्शन को कॉल करना (Calling)
let message = sayHello("Upendra");
console.log(message); // आउटपुट: नमस्ते Upendra
प्रश्न 20 – जावास्क्रिप्ट में इवेंट्स क्या होती है?
इवेंट्स की अवधारणा (What are Events?)
जब उपयोगकर्ता वेब पेज पर कोई गतिविधि (Activity) करता है या ब्राउज़र में कोई बदलाव होता है, तो उसे इवेंट (Event) कहा जाता है। जावास्क्रिप्ट इन इवेंट्स को पहचानकर (Listen करके) तुरंत प्रतिक्रिया दे सकता है।
प्रमुख जावास्क्रिप्ट इवेंट्स:
onclick: जब उपयोगकर्ता किसी बटन या एलिमेंट पर माउस से क्लिक करता है।onload: जब वेब पेज पूरी तरह से ब्राउज़र में लोड (खुल) जाता है।onmouseover: जब माउस का कर्सर किसी टेक्स्ट या इमेज के ऊपर जाता है।onkeyup: जब कीबोर्ड का दबाया हुआ कोई बटन ऊपर छोड़ा जाता है।onsubmit: जब कोई ऑनलाइन फॉर्म सबमिट किया जाता है (वैलिडेशन के लिए महत्वपूर्ण)।
Unit – 5: ई-कॉमर्स और डिजिटल भुगतान (E-Commerce)
प्रश्न 21 – ई कॉमर्स क्या है? ई कॉमर्स का इतिहास और कार्यक्षेत्र को समझाइए।
ई-कॉमर्स क्या है? (What is E-Commerce?)
ई-कॉमर्स का पूरा नाम इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स (Electronic Commerce) है। इंटरनेट और कंप्यूटर नेटवर्क के माध्यम से वस्तुओं (Products) और सेवाओं (Services) को खरीदना, बेचना, मार्केटिंग करना या पैसों का लेनदेन करना ही ई-कॉमर्स कहलाता है। उदाहरण: Amazon, Flipkart आदि।
ई-कॉमर्स का इतिहास (History of E-Commerce)
- 1970 का दशक: इसकी शुरुआत EDI (Electronic Data Interchange) तकनीक के साथ हुई थी, जिससे व्यावसायिक दस्तावेज ट्रांसफर होते थे।
- 1994: नेटस्केप ब्राउज़र ने SSL सुरक्षा प्रोटोकॉल पेश किया, जिससे इंटरनेट पर क्रेडिट कार्ड ट्रांजैक्शन सुरक्षित हुआ।
- 1995: Amazon और eBay की शुरुआत हुई, जिसने ई-कॉमर्स की दुनिया बदल दी। भारत में 2007 में Flipkart के आने और बाद में UPI के आने से इसमें भारी उछाल आया।
ई-कॉमर्स का कार्यक्षेत्र (Scope/Models)
- B2B (Business to Business): जब एक बिजनेस दूसरी कंपनी को सामान बेचता है (जैसे निर्माता का थोक व्यापारी को बेचना)।
- B2C (Business to Consumer): जब कोई कंपनी सीधे आम ग्राहकों को सामान बेचती है (जैसे Amazon से ग्राहक द्वारा सामान खरीदना)।
- C2C (Consumer to Consumer): जब एक ग्राहक सीधे दूसरे ग्राहक को पुराना सामान बेचता है (जैसे OLX या Quikr पर पुरानी बाइक बेचना)।
- C2B (Consumer to Business): जब कोई व्यक्तिगत उपभोक्ता (जैसे फ्रीलांसर या ब्लॉगर) अपनी सेवाएं किसी कंपनी को बेचता है।
प्रश्न 22 – ई-कॉमर्स के प्रमुख लाभ तथा हानियाँ समझाइए।
ई-कॉमर्स के लाभ (Benefits)
- 24/7 उपलब्धता: ई-कॉमर्स वेबसाइट्स कभी बंद नहीं होतीं, ग्राहक किसी भी समय ऑर्डर कर सकता है।
- वैश्विक पहुंच (Global Reach): कोई भी छोटा व्यापारी बिना बड़ी दुकान खोले इंटरनेट के जरिए देश-विदेश के ग्राहकों तक पहुंच सकता है।
- लागत में कमी: शोरूम का किराया, बिजली बिल और ज्यादा स्टाफ रखने की जरूरत नहीं होती, जिससे सामान अक्सर ऑफलाइन से सस्ता मिलता है।
- ग्राहकों के लिए आसान तुलना: ग्राहक एक साथ कई वेबसाइट्स पर जाकर सामान की कीमत और रिव्यूज की तुलना कर सकता है।
ई-कॉमर्स की हानियाँ (Limitations)
- भौतिक अनुभव का अभाव: ग्राहक कपड़े या अन्य सामान को खरीदने से पहले छूकर उसकी गुणवत्ता नहीं परख सकता।
- डिलिवरी में समय: ऑर्डर करने के बाद सामान घर पहुंचने में कुछ दिनों (2 से 5 दिन) का समय लगता है।
- सुरक्षा और साइबर फ्रॉड: क्रेडिट/डेबिट कार्ड की जानकारी चोरी होने या नकली शॉपिंग वेबसाइट्स द्वारा धोखाधड़ी का खतरा रहता है।
- इंटरनेट पर निर्भरता: बिना इंटरनेट और स्मार्टफोन/कंप्यूटर के इसका उपयोग संभव नहीं है।
प्रश्न 23 – ई-कॉमर्स भुगतान प्रणाली के प्रकार लिखिए।
ई-कॉमर्स वेबसाइट्स पर खरीदारी के बाद डिजिटल रूप से पैसे चुकाने के लिए निम्नलिखित प्रणालियां उपलब्ध हैं:
- क्रेडिट/डेबिट कार्ड भुगतान: कार्ड नंबर, एक्सपायरी डेट, CVV और बैंक से जुड़े मोबाइल पर आने वाले OTP के जरिए सुरक्षित भुगतान।
- UPI (Unified Payments Interface): भारत का सबसे लोकप्रिय माध्यम (जैसे PhonePe, Google Pay, Paytm)। इसमें सीधे बैंक खाते से केवल UPI PIN डालकर तुरंत पैसा ट्रांसफर हो जाता है।
- नेट बैंकिंग (Net Banking): इसमें ग्राहक अपने बैंक की वेबसाइट पर यूजर आईडी और ट्रांजैक्शन पासवर्ड डालकर भुगतान की पुष्टि करता है।
- डिजिटल वॉलेट (Digital Wallets): ग्राहक अपने पेटीएम या अमेज़न पे वॉलेट में पहले से पैसे ऐड करके रखता है और वन-क्लिक में भुगतान करता है।
- कैश ऑन डिलीवरी (COD): इसमें ग्राहक को पहले पैसे नहीं देने होते, बल्कि जब कूरियर वाला सामान घर लेकर आता है, तब नकद या डिजिटल भुगतान किया जाता है।
प्रश्न 24 – ई-मार्केटिंग क्या है? ई मार्केटिंग के प्रकार लिखिए।
ई-मार्केटिंग क्या है? (What is E-Marketing?)
ई-मार्केटिंग का अर्थ है इलेक्ट्रॉनिक मार्केटिंग या डिजिटल मार्केटिंग। इंटरनेट, सर्च इंजन, सोशल मीडिया और डिजिटल उपकरणों के माध्यम से किसी उत्पाद, कंपनी या सेवा का विज्ञापन और प्रचार-प्रसार करना ही ई-मार्केटिंग कहलाता है।
ई-मार्केटिंग के प्रमुख प्रकार:
- SEO (Search Engine Optimization): अपनी वेबसाइट को इस तरह ऑप्टिमाइज़ करना कि वह गूगल सर्च में बिना पैसे दिए (Organically) सबसे ऊपर दिखाई दे।
- SMM (Social Media Marketing): फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और लिंक्डइन पर पोस्ट या पेड विज्ञापन चलाकर ग्राहकों को आकर्षित करना।
- Email Marketing: संभावित ग्राहकों को सीधे ईमेल भेजकर नए ऑफर्स और प्रोडक्ट्स की जानकारी देना।
- PPC (Pay-Per-Click): गूगल या अन्य साइट्स पर पेड (Paid) विज्ञापन चलाना, जिसमें जितने क्लिक होंगे उतने पैसे विज्ञापनदाता के कटते हैं।
- Affiliate Marketing: ब्लॉगर्स या इंफ्लुएंसर्स द्वारा किसी कंपनी के प्रोडक्ट का लिंक शेयर करके कमीशन कमाना।
प्रश्न 25 – एम-कॉमर्स क्या है? इसके फायदे और नुक्सान समझाइए।
एम-कॉमर्स क्या है? (What is M-Commerce?)
एम-कॉमर्स का पूरा नाम मोबाइल कॉमर्स (Mobile Commerce) है। यह ई-कॉमर्स का ही एक उन्नत रूप है। जब खरीदारी, बिक्री या बैंकिंग से जुड़े सभी लेनदेन कंप्यूटर के बजाय स्मार्टफोन, टैबलेट या समर्पित मोबाइल एप्लीकेशंस (Apps) के माध्यम से वायरलेस तरीके से किए जाते हैं, तो उसे एम-कॉमर्स कहते हैं।
एम-कॉमर्स के फायदे (Advantages)
- पोर्टेबिलिटी (Mobility): मोबाइल हमेशा हमारे पास रहता है, इसलिए यात्रा करते समय भी कहीं से भी ऑर्डर या बैंकिंग की जा सकती है।
- पुश नोटिफिकेशन: कंपनियां ऐप्स के जरिए सीधे मोबाइल स्क्रीन पर डिस्काउंट और ऑफर्स के पॉप-अप नोटिफिकेशन भेज सकती हैं, जिससे बिक्री बढ़ती है।
- बायोमेट्रिक सुरक्षा: फिंगरप्रिंट और फेस लॉक के कारण भुगतान प्रक्रिया अधिक तेज और सुरक्षित हो जाती है।
एम-कॉमर्स के नुकसान (Disadvantages)
- छोटी स्क्रीन: मोबाइल की स्क्रीन छोटी होने के कारण सामान के बारीक विवरण या स्पेसिफिकेशन्स देखने में कभी-कभी परेशानी होती है।
- सुरक्षा जोखिम: मोबाइल चोरी होने या खो जाने पर शॉपिंग ऐप्स और वॉलेट्स का गलत इस्तेमाल होने का खतरा बढ़ जाता है।
- ऐप मेंटेनेंस: कंपनियों को एंड्रॉइड और आईओएस दोनों के लिए अलग-अलग भारी ऐप्स बनाने और बार-बार अपडेट करने पड़ते हैं जो खर्चीला है।
प्रश्न 26 – Electronic Payment System (EPS) क्या है?
EPS की तकनीकी परिभाषा (What is EPS?)
इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट System (EPS) एक ऐसी वित्तीय और तकनीकी प्रणाली है जो भौतिक कैश (कागज के नोटों) के बिना, पूरी तरह से इंटरनेट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के द्वारा दो पक्षों (क्रेता और विक्रेता) के बीच पैसों के सुरक्षित और तीव्र लेनदेन (वित्तीय ट्रांसफर) की अनुमति देती है।
EPS के मुख्य घटक (Components of EPS)
- भुगतानकर्ता (Payer): जो पैसे भेज रहा है (ग्राहक)।
- प्राप्तकर्ता (Payee): जिसे पैसे मिल रहे हैं (व्यापारी)।
- पेमेंट गेटवे (Payment Gateway): एक सुरक्षित माध्यम जो ग्राहक के कार्ड/पिन की जानकारी को एन्क्रिप्ट (कूटभाषा) करके बैंकों के बीच पुल का काम करता है (जैसे Razorpay, PayU)।
- कार्ड नेटवर्क: जैसे Visa, MasterCard, या RuPay जो ट्रांजैक्शन को रूट करते हैं।
EPS के लाभ
- यह पूरी तरह से कैशलेस इकोनॉमी को बढ़ावा देता है।
- लेनदेन का पूरा डिजिटल रिकॉर्ड और इतिहास सुरक्षित रहता है।
- हर ट्रांजैक्शन 2-Factor Authentication (2FA) और ओटीपी द्वारा सुरक्षित होता है, जिससे धोखाधड़ी की संभावना न्यूनतम हो जाती है।
माखनलाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी (MCU) के सिलेबस के अनुसार, DCA 2nd सेमेस्टर में Internet and E-Commerce का मुख्य थ्योरी एग्जाम आमतौर पर 50 या 80 अंकों का होता है (यह आपके एडमिशन वर्ष और यूनिवर्सिटी के तत्कालीन ऑर्डिनेंस पर निर्भर करता है)। परीक्षा में पास होने के लिए न्यूनतम 40% अंक लाना अनिवार्य होता है।
इंटरनेट का कोई एक इकलौता मालिक, राजा या देश नहीं है। यह दुनिया भर के हजारों निजी, सरकारी और शैक्षणिक नेटवर्कों का एक स्वैच्छिक सहयोग है। हालांकि, इंटरनेट सुचारू रूप से चलता रहे, इसके लिए कुछ वैश्विक संस्थाएं जैसे W3C (World Wide Web Consortium) और IETF इसके नियम और प्रोटोकॉल तय करती हैं।
इंटरनेट और WWW दोनों अलग-अलग चीजें हैं:
इंटरनेट (Internet): यह दुनिया भर के कंप्यूटरों और तारों का एक भौतिक नेटवर्क (Hardware Network) है।
WWW (World Wide Web): यह इंटरनेट पर मौजूद सूचनाओं, वेब पेजों और वेबसाइटों का एक संग्रह है, जिसे हम ब्राउज़र के जरिए एक्सेस करते हैं। आप कह सकते हैं कि इंटरनेट एक सड़क है और WWW उस पर चलने वाली गाड़ियाँ (सूचनाएं) हैं।
जब इंटरनेट के माध्यम से कंप्यूटर या लैपटॉप का उपयोग करके ऑनलाइन सामान खरीदा या बेचा जाता है, तो उसे E-Commerce कहते हैं। वहीं, जब यही काम विशेष रूप से स्मार्टफोन, टैबलेट या मोबाइल ऐप्स (जैसे Flipkart/Amazon App) के माध्यम से वायरलेस तरीके से किया जाता है, तो उसे M-Commerce कहा जाता है। एम-कॉमर्स, ई-कॉमर्स का ही एक एडवांस रूप है।
HTML फाइल के अंदर जावास्क्रिप्ट कोड को <script> और </script> टैग के बीच में लिखा जाता है। इसे आप HTML के <head> सेक्शन के अंदर या फिर <body> सेक्शन के बिल्कुल अंत में (क्लोज़िंग </body> टैग से ठीक पहले) जोड़ सकते हैं। इसके अलावा बाहरी .js फाइल बनाकर भी इसे लिंक किया जा सकता है।
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