गायन्ति देवाः किलगीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमि भागे। स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूय पुरुषाःसुरत्वात्॥
अर्थ – देवगण भी स्वर्ग में गाते यही गुणगान हैं। स्वर्गसुख और मुक्ति का शुभपंथ हिन्दुस्थान है। देवताओं से अधिक सौभाग्यशाली हैं सभी मानव जो पावन भरत-भू की बन सके संतान हैं।
चारधाम
भारत की चार दिशाओं में स्थित चार धाम सनातन काल से राष्ट्र की सांस्कृतिक एकात्मता के प्रतीक हैं। इन चारों धामों की यात्रा हर हिन्दू के मन की अभिलाषा रहती है। ये धाम हैं –
(अ) बदरीनाथ धाम
भारत की उत्तरी सीमा पर उत्तराखण्ड में हिमालय की उत्तुंग चोटियों की गोद में बसे बदरीनाथ धाम में पवित्र अलकनन्दा नदी के दाहिने छोर पर स्थापित प्रमुख मन्दिर में श्री बदरीनारायण (विष्णु भगवान्) विराजमान हैं। उल्लेखनीय है कि इस मन्दिर के प्रधान पुजारी भारत के दक्षिणी छोर के केरल प्रान्त के नम्बूदरीपाद वंशीय ही होते हैं। शेष समय बर्फ से ढँके रहने से मन्दिर अक्षय तृतीया से दीपावली तक ही खुला रहता है।
गंगोत्री गंगोत्री, गंगा नदी का उद्गम स्थल है एवं उत्तराखण्ड के चार धाम तीर्थयात्रा में से एक है। नदी के स्रोत को भागीरथी कहा जाता है, और देवप्रयाग के बाद से यह अलकनन्दा में मिलती है, जहाँ से आगे गंगा नाम से जानी जाती है। पवित्र भागीरथी नदी का उद्गम गोमुख पर है जो कि गंगोत्री ग्लेशियर में स्थित है। गंगोत्री से गोमुख तक १९ किलोमीटर लम्बा मार्ग है।
यमुनोत्री कथा है कि असित मुनि अपनी वृद्धावस्था के कारण कलिन्द पर्वत में स्थित सप्तऋषि कुण्ड में स्नान करने नहीं जा पाए तो उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माँ यमुना उन्हीं की कुटिया से प्रकट हो गयीं। तभी से इस दैवीय स्थान को यमुनोत्री धाम के नाम से जाना जाता है। यमुना जी भगवान् सूर्य की पुत्री व यमराज की बहिन हैं। उत्तराखण्ड के चार धाम की तीर्थ यात्रा में यमुनोत्री एक है। यमुना के स्रोत यमुनोत्री का पवित्र गढ़, गढ़वाल के पश्चिम में स्थित मन्दिर है, जो बन्दरपूँछ पर्वत के एक शिखर पर स्थित है। यमुनोत्री में मुख्य आकर्षण देवी यमुना का मन्दिर और जानकीचट्टी (७ कि.मी. दूर) में पवित्र गर्म जल का झरना है।
केदारनाथ – यह उत्तराखण्ड के चार धामों में से एक है।
(आ) जगन्नाथ धाम
भारत की पूर्व दिशा में स्थित समुद्रतटीय राज्य ओडिशा में जगन्नाथपुरी के नाम से विख्यात नगरी में भगवान् जगन्नाथ (श्रीकृष्ण), बलभद्र और उनकी बहिन सुभद्रा की, नीम की लकड़ी से निर्मित काष्ठ प्रतिमाएँ हैं। जिस वर्ष आषाढ़ मास अधिक मास के रूप में आता है, पुरानी प्रतिमाओं के स्थान पर नवीन प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं। यह प्रक्रिया कलेवर परिवर्तन कहलाती है। जगन्नाथधाम की रथयात्रा एक विश्व प्रसिद्ध महोत्सव है।
जगन्नाथ धाम सामाजिक समरसता का अनूठा उदाहरण है – “जगन्नाथ का भात, पूछे जात न पात, जगत पसारे हाथ” यहाँ बनने वाले भात का प्रसाद बिना जाति-पाँति का भेदभाव किए सभी श्रद्धालु ग्रहण करते हैं। यहीं पर आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित गोवर्धन पीठ चार प्रमुख शांकर पीठों में से एक है।
जगन्नाथ रथ यात्रा
पद्मपुराण के अनुसार, भगवान् जगन्नाथ की बहिन सुभद्रा ने एक बार नगर देखने की इच्छा जताई, तब जगन्नाथ और बलभद्र अपनी लाड़ली बहिन सुभद्रा को रथ पर बैठाकर नगर दिखाने निकल पड़े। इस दौरान वे मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) भी गए। यहाँ वे सात दिन ठहरे। तभी से जगन्नाथ यात्रा की परम्परा चली आ रही है। जिस समय श्रीकृष्ण का स्वधामगमन हुआ, वह अपना हृदय छोड़ गए। यहाँ की मूर्तियों में साक्षात् रूप में भगवान् जगन्नाथ अवस्थित होते हैं, इसलिए उनके पूजन को आज भी भक्त अत्यन्त सौभाग्य मानते हैं।
(इ) द्वारकाधाम
द्वारकाधाम भारतवर्ष के पश्चिमी समुद्र तट पर स्थित है। द्वारकापुरी का निर्माण श्रीकृष्ण द्वारा करवाया गया। यह समुद्र से घिरी होने से बाह्य आक्रमणों से सुरक्षित थी। यहाँ श्रीकृष्ण द्वारकाधीश के नाम से विख्यात हैं। यह नगरी श्रीकृष्ण के इहलीला संवरण (परमधामगमन) के पश्चात् जलमग्न हो गई थी। इसके निकट ही बेट द्वारका है। कृष्ण की द्वारका के समुद्र में डूबी होने के प्रमाण अब पुरातात्त्विक और वैज्ञानिक कसौटियों पर सिद्ध हो चुके हैं। इसी स्थान पर समुद्र के १३० फुट नीचे ५६० फुट लम्बी मानव निर्मित दीवार के अवशेष मिले हैं। आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों में द्वारका पीठ और प्रसिद्ध सप्तपुरियों में एक होने से भी द्वारका विश्व प्रसिद्ध तीर्थ है।

श्री बेट द्वारका
श्री बेट द्वारकाधीश मन्दिर में भक्तों की अपार आस्था है। मन्दिर में श्रीकृष्ण की मूल मूर्ति उनकी पत्नी देवी रुक्मिणी द्वारा स्थापित की गई है। श्रीकृष्ण और उनके मित्र सुदामा की इसी स्थान पर भेंट हुई थी। सामान्यतः लोग द्वारका उस क्षेत्र को समझते हैं जहाँ गोमती नदी के तट पर भगवान् द्वारकाधीशजी का मन्दिर है। कम लोग जानते हैं कि द्वारका को तीन भागों में बाँटा गया है- मूल द्वारका, गोमती द्वारका और बेट द्वारका। मूल द्वारका को सुदामापुरी भी कहा जाता है।
यहाँ सुदामाजी का घर था जिसे भगवान् श्रीकृष्ण ने बनवाया था। गोमती द्वारका वह स्थान है जहाँ से भगवान् श्रीकृष्ण राजकाज किया करते थे और बेट द्वारका वह स्थान है जहाँ भगवान् का निवासस्थान था। जल से घिरी भूमि, जिसे हम द्वीप कहते हैं, इसे गुजराती में बेट कहा जाता है। अतः द्वारका का वह भाग जो मुख्य भूमि से पृथक् होकर द्वीप में परिवर्तित हो गया, उसे बेट द्वारका कहा जाने लगा।
(ई) रामेश्वरम् धाम
रामेश्वरम् धाम भारत के दक्षिणी प्रान्त तमिलनाडु के रामनाथपुरम् जिले में स्थित है। भगव.. श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वरम् शिवलिंग की गणना बारह ज्योतिर्लिंगों में की जाती है। श्रीराम द्वारा निर्मित सेतु आज भी पुरातात्त्विक प्रमाणों के साथ इस तीर्थ के निकट ही स्थित है। यहाँ स्थित शिवलिंग पर उत्तर में हिमालय में स्थित गंगोत्री तीर्थ से गंगाजल लाकर चढ़ाने की बड़ी महिमा है। यह परम्परा उत्तर और दक्षिण को जोड़ने वाली भारत की महान् सांस्कृतिक परम्परा है। यहाँ के मुख्य पुजारी उत्तर भारतीय रावल वंशीय होते हैं। रामेश्वरम् का मन्दिर अपनी अद्भुत वास्तुकला के लिए भी सुप्रसिद्ध है।
रामसेतु : धार्मिक महत्त्व
वाल्मीकि के महाकाव्य रामायण में रामसेतु का उल्लेख है। रामसेतु का निर्माण भगवान् राम की वानर सेना ने नल की देखरेख में इसलिए किया गया था ताकि वानरसेना राक्षसराज रावण का वध करने के लिए लंका पहुँच सके। पुल को तैरते हुए पत्थरों का इस्तेमाल करके बनाया गया था। ऐतिहासिक महत्त्व वाली एक भव्य संरचना रामसेतु, जिसे एडम्स ब्रिज, नलसेतु और सेतुबांदा भी कहा जाता है, रामायण का एक पुरातात्त्विक और ऐतिहासिक प्रमाण है। मान्यता है कि रामायण में उल्लिखित लंका वर्तमान की श्रीलंका है और रामसेतु भगवान् राम द्वारा बनवाया गया था। यद्यपि पहली सहस्राब्दी के कुछ संस्कृत ग्रंथों के अनुसार दोनों के बीच एक अन्तर है। इस मान्यता को विशेष रूप से दक्षिण भारत के चोल वंश के शासन के दौरान बढ़ावा दिया गया था, जिसने आर्य चक्रवर्ती राजवंश द्वारा अधिकार करने से पहले द्वीप पर आक्रमण किया था। आर्य चक्रवर्ती राजवंश ने श्रीलंका के जाफना में रामसेतु के संरक्षक होने का दावा किया था। समुद्र तटों की कार्बन डेटिंग और समुद्र सम्बन्धित अध्ययनों से इसके समय निर्धारण का पता चलता है जो रामायण काल से मेल खाता है।
पंचकेदार
श्री शिवमहापुराण के अनुसार भगवान् शंकर ने एक बार महिषरूप धारण किया था। उनके उस रूप के पाँच विभिन्न अंग पाँच स्थानों पर प्रतिष्ठित हुए। वे स्थान ‘केदार’ कहे जाते हैं।
1. श्री केदारनाथ यह मुख्य केदारपीठ है। यहाँ महिषरूपधारी शिव का पृष्ठभाग प्रतिष्ठित है। इसे प्रथम केदार कहते हैं। शेष चारों केदार-क्षेत्र भी उत्तराखण्ड में ही हैं।
2. श्री मध्यमेश्वर इनको मनमहेश्वर या मदमहेश्वर भी कहते हैं। यह द्वितीय केदार-क्षेत्र है। यहाँ महिषरूप शिव की नाभि प्रतिष्ठित है। ऊखीमठ (ऊषीमठ) से मध्यमेश्वर १८ मील है। ऊषीमठ से ही वहाँ तक एक मार्ग जाता है।
3. श्री तुंगनाथ यह तृतीय केदार-क्षेत्र है। यहाँ महिषरूप शिव की बाहु प्रतिष्ठित है। केदारनाथ से बदरीनाथ जाते समय तुंगनाथ स्थित है। तुंगनाथ-शिखर की चढ़ाई ही उत्तराखण्ड की यात्रा में सबसे ऊँची चढ़ाई है।
4. श्री रुद्रनाथ यह चतुर्थ केदार क्षेत्र है। यहाँ महिषरूप शिव का मुख प्रतिष्ठित है। तुंगनाथ से रुद्रनाथ-शिखर दिखता है; किन्तु मण्डल चट्टी से रुद्रनाथ जाने का मार्ग है। एक मार्ग हेलंग (कुमारचट्टी) से भी रुद्रनाथ जाता है।
5. श्री कल्पेश्वर यह पंचम केदार-क्षेत्र है। यहाँ शिव की जटाएँ प्रतिष्ठित हैं। हेलंग (कुमारचट्टी) में मुख्य मार्ग छोड़कर अलकनन्दा का पुल पार करके ६ मील जाने पर कल्पेश्वर का मन्दिर मिलता है। इस स्थान का नाम उरगम है।
सप्तबद्री
भगवान् नारायण लोक-कल्याणार्थ युग-युग में बदरीनाथ के रूप में स्थित रहते हैं। पंचकेदार के समान ही ये सप्तबद्री-क्षेत्र हैं। ये सभी क्षेत्र उत्तराखण्ड में हैं।
आदिबद्री – वर्तमान बदरीनाथ से माता घाटी पार कर धुलिंग मठ में स्थित है।
ध्यानबद्री – उरगम ग्राम में, कुमारचट्टी से ६ मील दूर स्थित है।
वृद्धबद्री – ऊषीमठ की कुमारचट्टी से ढाई मील दूर स्थित है।
भविष्यबद्री – जोशीमठ से १९ मील दूर स्थित है।
योगबद्री – पाण्डुकेश्वर से २ मील दूर स्थित है।
प्रधानबद्री – बदरीनाथ धाम के नाम से प्रसिद्ध यही प्रधान बदरी है।
नृसिंहबद्री – जोशीमठ में स्थित है।
यह कीजिए – इन पवित्र तीर्थों में से किसी तीर्थ की आपके परिवार या परिचय के किसी व्यक्ति ने यात्रा की है तो उनसे यात्रा वर्णन सुनकर लिखिए। आप भी भविष्य में एक बार इन स्थानों की यात्रा अवश्य कीजिए।
सप्तपर्वत
गिरि महेन्द्र मल्यागिरि सह्याद्रि हिमवान। विन्ध्य अरावली रैवतक पर्वत सात प्रधान॥
अर्थ – पर्वतों को धरती माता का पयोधर कहा जाता है। राष्ट्रीय एकात्मता की दृष्टि से विविध प्रान्तों में स्थित प्रमुख सात पर्वत विभिन्न तीर्थों और सांस्कृतिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक महत्त्व को अपने अंक में समाए शताब्दियों से भारतीय जनमानस के श्रद्धाकेन्द्र हैं।
(क) महेन्द्र पर्वत – उड़ीसा के गंजाम जिले से तमिलनाडु में मदुरै तक फैली पर्वतश्रृंखला महेन्द्र गिरि या महेन्द्र मलै है। इस पर्वत को भगवान् परशुराम की तपःस्थली माना जाता है।
(ख) मल्याचल – कर्नाटक में मैसूर के दक्षिण और केरल में त्रावणकोर के पूर्व में सुगन्धित चन्दन वृक्षों के लिए प्रसिद्ध पर्वत मल्याचल है। यह महर्षि अगस्त्य की तपोभूमि रहा है।
(ग) सह्याद्रि – महाराष्ट्र से कर्नाटक की सीमा तक व्याप्त कृष्णा और कावेरी जैसी पवित्र नदियों का उद्गम सह्याद्रि भारत के पश्चिमी घाट की सुदीर्घ पर्वतश्रृंखला है। छत्रपति शिवाजी महाराज की शौर्यगाथाएँ कहते रायगढ़,प्रतापगढ़, सिंहगढ़, पुरन्दरगढ़ आदि दुर्ग इसी पर स्थित हैं। विश्व में जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध होने से इसे यूनेस्को की विश्वविरासत सूची में स्थान प्राप्त है।
(घ) देवतात्मा हिमालय – पूर्व से पश्चिम को जोड़ती उत्तर दिशा में स्थित भारत की सीमा का अटल प्रहरी हिमालय ऋषि-मुनियों की प्रिय तपस्याभूमि रहा है। अनेक तीर्थस्थान एवं रमणीयता स्वर्गोपम होने से यह देवतात्मा कहलाया। बदरी, केदार, गंगोत्री, यमुनोत्री, कैलास, मानसरोवर, अमरनाथ आदि अनेक तीर्थ हिमालय में बसे हैं। यह अनेक शक्तिपीठों से समृद्ध है। महर्षि वेदव्यास ने श्रीगणेश जी से महाभारत का लेखन इसी की एक कन्दरा में करवाया था। गंगा, यमुना, सिन्धु आदि सदानीरा पवित्र नदियों का यह उद्गम स्थल है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह देवी पार्वती का जनक है। पाण्डवों ने स्वर्गारोहण भी इसी पर्वत के मार्ग से किया था। सामरिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी हिमालय का स्थान हमारे देश के लिए सर्वोच्च है। यहाँ अनेक जैव-प्रजातियाँ और दुर्लभ औषधियाँ पायी जाती हैं।
ये गिरि-पर्वत हिमवन्त, गहन वन तेरे, हे मातृभूमि! हों मोद-निकेतन मेरे। पिंगल श्यामल अरुणाभ अनूप अचंल, हे हरिपालित बहुरूप धरा का अंचल। अविजित, अक्षत, आघात-रहित नित होकर, मैं करूँ यहाँ अधिवास त्रास सब खोकर॥




